खचाखच भरी रेलगाड़ी – निर्मल गुप्त की कविता

निर्मल गुप्त की कविता : खचाखच भरी रेलगाड़ी

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
एक पैर पर अपना सन्तुलन बना
उसने कर लिया खुद को स्थगित
अब उसके सिवा सभी को है
जल्द से जल्द घर वापसी की
आकुल आतुरता।

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
गमकता है पसीना नमक की तरह
द्रव अपने बहने के लिए
जबरन रास्ते ढूंढ लेता है
आदमी के पास नहीं होता
ऐसा कोई विकल्प।

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
सब पहचानते हैं एक दूसरे को
लेकिन बने रहते हैं अनजान
तकलीफों की निजता के बीच
दूरियों का होता है
अपना तिलिस्म

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
बजती है ढोलक, झनझनाते हैं मँजीरे
बँटते है प्रसाद के बताशे
मिलता है सिर्फ उन्हीं को
जो सबको धकिया देते हैं
अपनी आस्था के बाहुबल से।

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
कोई न कोई पा लेता है
छत पर टंगे पंखे की जाली पर
धूलभरी चप्पल को टिका
आलथी पालथी मारने की जगह
प्रजा जानती है पादुकासीन होना।

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
ज़िन्दगी कभी नहीं थमती
लोहे की पटरियों पर घिसटती है निरंतर
कोई रोज़ पूछता है आज से
क्या डिब्बा कल भी भरा होगा
आज की तरह खचाखच?

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